Sunday, March 19, 2006

हिन्दी ब्लॉग जगत

तो लीजिए जनाब/मोहतर्मा, दूसरा ब्लॉग। मैने सोचा ना था इतनी जल्दी लिख पाऊँगा।

इंटरनेट की तो पहले से लत लगी हुई है, पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग पढ़ने की लत लग गई है। किसी विशेश विषय पर नही, युँ ही ब्लॉग जगत में भटक रहा हूँ, बिन उद्देश्य। एक के बाद एक कड़ियाँ पकड़ता, कई लोगों के पन्नों में झाँकता, कहीं, टिप्पणियाँ छोड़ता, भटक रहा हूँ।

कल रात ब्लॉगस्पॉट पर "हिंदी" शब्द पे खोज की। पहली ही कुछ कड़ियों मे से थी,सुनील जी के पन्ने की कड़ी। कई सारे चिट्ठे पढ़ डाले। फिर वहाँ से कड़ियाँ पकड़ता हुआ जो निकला, कब दो बज गये पता ही नही चला। साधारनतया साढ़े ग्यारह बजे तक मैं खर्राटे भरने लगता हूँ। पर इच्छा ही नही हुई की कंप्युटर बन्द कर के सोया जाए। करीब तीन बजे, नीन्द असह्य हो गई, आँखें खुद-ब-खुद बन्द होने लगी, कम्प्युटर बन्द कर के सो गया। सुबह उठा, मग भर के चाय बनाई, और ले कर बैठ गया, रात जिस कड़ी प
छोड़ा था, वहीं से आगे बढ़ने। शाम हो गयी है, और मैं लगा हुआ हूँ।

कल शाम तक मै इस भ्रम में था कि हिन्दी मे कुछ गिने चुने लोग ही ब्लॉग लिखते होंगे। भ्रम टूट गया। पर एक बात है, युवा बहुत कम हैं। हमारी पीढ़ी अंग्रेज़ी मे लिखने में ही व्यस्त है। हिन्दी में लिखेंगे भी कैसे, अधिकांश को तो वर्णमाला भी याद नहीं है।

अभी तो केवल झाँकता हुआ गुज़र रहा हूँ, पर इरादा है इन में से कुछ लोगों को नियमित रूप से पढ़ने का। एक फायदा यह है कि, समकालीन हिन्दी साहित्य की आलोचना पढ़ने का अवसर मिलेगा। लेकिन किताबें खरीदनी पड़ेंगी, मुझे लगता नहीं, बैंगलोर में किसी पुस्तकालय में मिलेंगी। यदि आप ऐसे किसी पुस्तकालय के बारे में जानते हों तो टिप्पणी अवश्य छोड़ते जाईए।


उम्मीद है, इन महारथियों को पढ़ते रहने से सम्भवतः लिखने की प्रेरणा मिलती रहेगी। अधिक आशाएँ न रखें, कुछ खास नही लिखुँगा, यूँ ही बेसिरपैर की फ़ेंकता रहूँगा।

Wednesday, March 15, 2006

पहला ब्लॉग

इस बार कुछ खास लिखने का कोइ इरादा नही है। बस देखना चाहता हूँ हिन्दी में ब्लॉग दिखता कैसा है।

पिछले तीन वर्षों से मै ब्लॉगिंग की दुनिया को देख रहा हूँ, बाहर से। कई बार इच्छा भी हुई की ब्लॉगिंग में गोता लगा लिया जाए।पर मेरे ब्लॉग पढ़ना कौन चाहेगा ? इससे बड़ा कारण था आलस्य। पढ़ता था, पर कुछ ही लोगों का लिखा, प्रायः दोस्तों के ही ब्लॉग। फिर पिछले चन्द हफ्तों में कई और पढ़े, और एक के बाद एक, कई बुकमार्क जुड़ गए मेरे ब्लॉगलाइन्स में।

ब्लॉग की शक्ति का अन्दाज़ा अब जा कर हुआ है मुझे। मानस से इस बारे में बातें कई बार हुइ थी, पर उस समय मुझे इस बात का आभास तब नही हुआ था की वास्तव में यह इतना शक्तिशाली माध्यम है।

तो मुद्दा यह है कि मैने भी ब्लॉगिंग के सागर मे छलांग लगा ली है। इरादा दर्शन में या हिंदी मे अपनी पैठ का ढिंढोरा पीटने का बिल्कुल नही है, और न ही रोज़मर्रा की आम बातों को यहाँ लिख कर इसे अपनी डायरी बनाने का। फिलहाल इरादा है सिर्फ लिखित हिंदी का अभ्यास। जब से हाई स्कूल छोड़ा है, मेरी हिंदी की शब्दावली छोटी होती जा रहा है।

नाम मैने ऐसा क्यों रख दिया पता नही। अब जो है सो है, बदलूँगा नही।

अगली बार कब पोस्ट करूंगा, खुद नही जानता ।